जल रही धरती ,तप रहा आकाश
मची हुयी है हाहाकार है सूख चुके जल स्त्रोत बिशाल
नदी ,कूप औ बड़े ताल जल रहे मरूस्थल , विकट ज्वाल हो रहा आई•पी•एल•बेमिशाल है फिक्र किसे किसको मलाल निर्धन ,गरिब किसान परिवार जल जीवन बिन तज रहे प्रान सरकारो अब ऑखे खोलो दु:ख,दर्द जरा इनकी भी हरो लातुर गया नान्देड़ गया बुन्देल खण्ड भी झेल गया बाॅदा,बदाॅयू घूटते बेहाल समाजवाद कैसा कमाल आयोग अनेको बने पड़े
जनता से दूर है सभी खड़े ऊपर से है पानी आया लीटर से होगा बटॅवारा पर उनकी प्यास नही बुझनी है पहूँच न उपर तक जिनकी
सब भुगत रहे अपनी करनी दोहन अथाह प्रकृति जो की
पशु ,पक्षी चाहे मानव मजबुर हो रहे पलायन सरकारों नींद से अब जागो
दु:ख दर्द जरा इनकी बाॅटो।।
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