"ए मरदे का होई।"
"काहे कुच्छो बतईले ना का।"
प्रश्न का उत्तर ना देते हुए एक हृदयविदारक प्रश्न हमारे प्रगाढ़ मित्र गौरव ने हमीं से पूछ लिया।
हम क्या जवाब देते कि,अंदर कितनी बेइज्जती हुई।वैसे एक बात बताएं गौरव हमारे अंतर्मन की बात जान लेता है।उ हमारा खास मित्र है ई बात केवल हम नहीं कहते हैं।ई बात सारी फैकल्टी जानती है।
बात प्रथम वर्ष प्रथम सत्रांश के अंतिम दिनों की है।संकाय द्वारा राजभाषा,देवभाषा,प्राचीन भारतीय इतिहास तथा संस्कृति एवं पुरातत्व व आंग्ल भाषा जबरदस्ती की भाषा के रूप में प्रदत्त थे।
राजभाषा के तो क्या कहनें!राजभाषा मतलब समझ रहे हैं न,मतलब कि हिंदी।कक्षाएं सुचारू रूप से तो नहीं पर चल रही थी,हम परंपरा के बारे में जान रहे थे,हम अपनी हिंदी के बारे में जान रहे थे,इतिहास पढ़ने में तो आनंद के साथ साथ आनंद का बाप भी आ रहा था।आंग्ल भाषा मतलब एबीसीडी नहीं बल्कि कुछ कविताएं और कहानियां अंग्रेजी में थी।
बची थी देवभाषा।
देवभाषा(संस्कृत) कक्षा 10 तक पढ़ी थी।11 और 12 में अनिवार्य संस्कृत हिंदी के साथ थी। पर अब तो शुरुआत से स्टार्ट करना था।कि कब संस्कृत की शुरुआत हुई?
कैसे माहेश्वर सूत्र आएं?
कैसे लौकिक संस्कृत का व्याकरण बना?
कैसे पाणिनी मुनि ने उन्हें बनाया?
मजा तो आ रहा था।तो श्रीगणेश भगवान शिव द्वारा पाणिनी मुनि को प्रदत्त सूत्रों से हुआ।सूत्रों को पढ़ के हम खुद को संस्कृत का विद्वान समझने लगे थे।धीरे धीरे लघु सिद्धांत कौमुदी के माध्यम से वर्णों को जाना,फिर कालिदास के ग्रंथ कुमारसंभवम् मे हिमालय का वर्णन पढ़ा।
हमारे हिसाब से तो अध्ययन जोरों पर था।पर औरो को लग रहा था अध्ययन छोड़ के बाकी सब जोरों पर है।
तो सेमेस्टर के आखिर में परीक्षा से पहले संस्कृत का वाइवा था।बाहर सबको ज्ञान देने वाले अंदर अज्ञानी बनकर डांट खा रहे थे।हां मैं भी डांट खा रहा था।बाहर आया चेहरे पर कक्षा के उत्कृष्टतम बच्चे से भी ज्यादा खुशी थी।पर मित्रवा नें सब कुछ जान लिया।फिर वही दो पंक्तियां जो प्रारंभ में लिखी है,वही बात हुई।
मेरा तो वाइवा खराब चला गया था।गौरव का बचा था।हमारी पेशानियों पर बल पड़ रहे थे,मन में प्रण था कि अगले सत्र से मुसलसल काविश की जाएगी।
अचानक कथा का शीर्षक सामने से गुजरा।हाँ कथा का शीर्षक!
मन में आया,कि बिहारी की तरह काव्य रचना करने लगे या घनानंद की तरफ प्रेम के गीत गाने लगे या मलिक मोहम्मद जायसी की तरह उनके रूप का वर्णन किया जाए।
हम उलझन में थे।
वेशभूषा तो उनकी बहुत ही अलग थी।बिल्कुल विलायती वेशभूषा थी मोहतरमा की।
मानों अबहिएं लंदन से आयें हो।
हाफ पैंट(हॉफ की भी हॉफ),बॉयज कट बाल,मुफ्ती की टीशर्ट,पीठासीन छोटा वाला बैग,कान में सोनी का हेडफोन,हाथों में एप्पल का महंगा मोबाइल।
हम तो थे आदत से लाचार।मुँह बा के खालि देखते रह गयें।
तभी एक मित्र ने बताया कि दिल्ली की है।उसी वक्त इस कहानी के शीर्षक तथा कथानक ने जन्म ले लिया।
वाइवा की थकान,नंबर नहीं पाने का भय,बाद में पढ़ने का जोश,फेल होने का खतरा सब काफूर हो गए।मैं क्या सारे किशोरवय छात्र छात्राएं उसे ही देख रहे थे।आसपास के मित्र शोर मचा रहे थे कि बबवा त अश्लीलानंद बाबा निकला।
इतिश्री।
शायद........
"काहे कुच्छो बतईले ना का।"
प्रश्न का उत्तर ना देते हुए एक हृदयविदारक प्रश्न हमारे प्रगाढ़ मित्र गौरव ने हमीं से पूछ लिया।
हम क्या जवाब देते कि,अंदर कितनी बेइज्जती हुई।वैसे एक बात बताएं गौरव हमारे अंतर्मन की बात जान लेता है।उ हमारा खास मित्र है ई बात केवल हम नहीं कहते हैं।ई बात सारी फैकल्टी जानती है।
बात प्रथम वर्ष प्रथम सत्रांश के अंतिम दिनों की है।संकाय द्वारा राजभाषा,देवभाषा,प्राचीन भारतीय इतिहास तथा संस्कृति एवं पुरातत्व व आंग्ल भाषा जबरदस्ती की भाषा के रूप में प्रदत्त थे।
राजभाषा के तो क्या कहनें!राजभाषा मतलब समझ रहे हैं न,मतलब कि हिंदी।कक्षाएं सुचारू रूप से तो नहीं पर चल रही थी,हम परंपरा के बारे में जान रहे थे,हम अपनी हिंदी के बारे में जान रहे थे,इतिहास पढ़ने में तो आनंद के साथ साथ आनंद का बाप भी आ रहा था।आंग्ल भाषा मतलब एबीसीडी नहीं बल्कि कुछ कविताएं और कहानियां अंग्रेजी में थी।
बची थी देवभाषा।
देवभाषा(संस्कृत) कक्षा 10 तक पढ़ी थी।11 और 12 में अनिवार्य संस्कृत हिंदी के साथ थी। पर अब तो शुरुआत से स्टार्ट करना था।कि कब संस्कृत की शुरुआत हुई?
कैसे माहेश्वर सूत्र आएं?
कैसे लौकिक संस्कृत का व्याकरण बना?
कैसे पाणिनी मुनि ने उन्हें बनाया?
मजा तो आ रहा था।तो श्रीगणेश भगवान शिव द्वारा पाणिनी मुनि को प्रदत्त सूत्रों से हुआ।सूत्रों को पढ़ के हम खुद को संस्कृत का विद्वान समझने लगे थे।धीरे धीरे लघु सिद्धांत कौमुदी के माध्यम से वर्णों को जाना,फिर कालिदास के ग्रंथ कुमारसंभवम् मे हिमालय का वर्णन पढ़ा।
हमारे हिसाब से तो अध्ययन जोरों पर था।पर औरो को लग रहा था अध्ययन छोड़ के बाकी सब जोरों पर है।
तो सेमेस्टर के आखिर में परीक्षा से पहले संस्कृत का वाइवा था।बाहर सबको ज्ञान देने वाले अंदर अज्ञानी बनकर डांट खा रहे थे।हां मैं भी डांट खा रहा था।बाहर आया चेहरे पर कक्षा के उत्कृष्टतम बच्चे से भी ज्यादा खुशी थी।पर मित्रवा नें सब कुछ जान लिया।फिर वही दो पंक्तियां जो प्रारंभ में लिखी है,वही बात हुई।
मेरा तो वाइवा खराब चला गया था।गौरव का बचा था।हमारी पेशानियों पर बल पड़ रहे थे,मन में प्रण था कि अगले सत्र से मुसलसल काविश की जाएगी।
अचानक कथा का शीर्षक सामने से गुजरा।हाँ कथा का शीर्षक!
मन में आया,कि बिहारी की तरह काव्य रचना करने लगे या घनानंद की तरफ प्रेम के गीत गाने लगे या मलिक मोहम्मद जायसी की तरह उनके रूप का वर्णन किया जाए।
हम उलझन में थे।
वेशभूषा तो उनकी बहुत ही अलग थी।बिल्कुल विलायती वेशभूषा थी मोहतरमा की।
मानों अबहिएं लंदन से आयें हो।
हाफ पैंट(हॉफ की भी हॉफ),बॉयज कट बाल,मुफ्ती की टीशर्ट,पीठासीन छोटा वाला बैग,कान में सोनी का हेडफोन,हाथों में एप्पल का महंगा मोबाइल।
हम तो थे आदत से लाचार।मुँह बा के खालि देखते रह गयें।
तभी एक मित्र ने बताया कि दिल्ली की है।उसी वक्त इस कहानी के शीर्षक तथा कथानक ने जन्म ले लिया।
वाइवा की थकान,नंबर नहीं पाने का भय,बाद में पढ़ने का जोश,फेल होने का खतरा सब काफूर हो गए।मैं क्या सारे किशोरवय छात्र छात्राएं उसे ही देख रहे थे।आसपास के मित्र शोर मचा रहे थे कि बबवा त अश्लीलानंद बाबा निकला।
इतिश्री।
शायद........