Friday, 10 May 2019

कविता लिखने की कोशिश

आज फिर,
कविता लिखने की कोशिश हुई।
बल्कि यूं कहें कि,
दिमाग की अच्छी-खासी वर्जिश हुई।
तो हमारे कर्तव्यकर्म के सहायक कौन-कौन थे?
और हमारे इस कल्पित संसार के नायक कौन-कौन थे?
तो सहायक थी,
मेरी डायरी,
महंगी वाली कलम,
हमारी झुंझलाहट और विकराल गर्मी।
परिदृश्य कपोल कल्पित,
नायक अलौकिक और सात्विक,
प्रतिनायक था कुकर्मी व तामसिक,
तो परंपरा अनुसार,
नायक को उत्तम से भी उपर उत्तमोत्तम बताया गया।
नायिका को मुग्धा,
और प्रतिनायक को अधम बताया गया।
नायक व प्रति नायक उन्नीस-बीस ही थे,
किसी को अधिक तो,
किसी को थोड़ा कम बताया गया।
चूंकि उस संसार का स्रष्टा मैं ही था,
और तो और,
विनाशक,रक्षक और युगदृष्टा भी मैं ही था।
वहां पर पसरी दिगंत तक मादकता थी।
लेकिन,
उस रोमानी कल्पना के पीछे छिपी,
गंभीर भयावहता थी।
पर क्या इतने से परिचय को,
इतिहास कहा जा सकता है?
क्या इन्हीं अचेतन मस्तिष्क की कल्पनाओं मे,
ही आजीवन रहा जा सकता है?
मस्तिष्क की गहरी और चौड़ी स्वप्निल सुरंग,
उस में घूमते घोड़े के पर्यायवाची,
यथा-बाजी,हय व तुरंग।
उपरोक्त,
पंक्तियों को पढ़कर,
आप कह सकते हैं कि,
मैं मिथकीय हूं!
होना भी जरूरी है।
मिथक का अर्थ है-अर्द्धसत्य या कल्पना।
और कवि का काव्यत्व ही कल्पना है।
वह मिथकीयता ही है,
जो मुझसे अद्भुत और मायावी संसार गढ़वाती है।
और मैं आजीवन मिथकीय ही रहूंगा।
क्योंकि मिथकीयता ही है,
जो मुझे भावुक होने से बचाती है।
नहीं लिखा जाता मुझसे यथार्थ!
कैसे लिख पाऊंगा?
अब तो साहित्य की दया से,
यथार्थ के भी भेदोपभेद हो गए हैं।
जैसे--
         पत्रकारों व नेताओं का शाब्दिक यथार्थ।
         पुराने लोगों का पुराना यथार्थ।
         भारत भूषण अग्रवाल का स्वप्नहीन
         यथार्थ।
         और उदय प्रकाश का नया-नवेला
         जादुई यथार्थ।
         बचता है भविष्य का असंभावित
         यथार्थ।
दिनकर कहते हैं कि,
"अनगिनत है आपदाएँ"।
मैं कहता हूं कि,
यथार्थ भी अनगिनत है।
बकौल अशोक वाजपेयी-"भावुकता कवि को जटिलताओं को व्यक्त करने से रोकती है"।
किसी ने सच ही कहा है कि,
एक भावुक व्यक्ति हमेशा ऊहापोह में ही ग्रस्त रहता है।
उसकी अंतरात्मा अनिश्चय और निश्चय के बीच झूलती रहती है।
अरे हम कहां से चलें,
और कहां को भटक गए।
जैसे आसमान से गिरें,
और खजूर में अटक गयें।
तो,
इस कविता का मतलब,
नहीं है कुछ खास।
होने लगा है,
तुकों की कमी का आभास।
वहीं भग्न और अधूरे कल्पना-मिश्रित यथार्थ का कचरा,
है हमारे पास।
और रघुवीर सहाय के अनुसार तो-"पतझड़ के बिखरें पत्तों पर ही चढ़कर आता है मधुमास"।

~दिव्य प्रकाश सिंह 'अवधुत'
 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस

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