विवाद----"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?
उस जलील जानवर का नाम मेरे सामने लेने की।"
संवाद----"जलील जानवर!क्या बकवास है?"
वाद----"हाँ हाँ जलील जानवर"
कहानी है अरबाज और अभिषेक की।
दो दोस्त,
सच्चे वाले दोस्त।
जहाँ अभिषेक एक रूढ़िवादी पंडित का लड़का था।
वहीं अरबाज एक लिबरल मुस्लिम का।
पर दोनों की सोच अपने पिता से बहुत अलग थी।
अरबाज जहां अपने बाप की विपरीत विचारधारा का था,वहिं अभिषेक को कट्टरता में बिल्कुल भी विश्वास नहीं था।
अभिषेक एक छोटे से स्कूल में पढ़ता था हिंदी मीडियम था शायद।
अरबाज एक बड़े से नामी कॉन्वेंट स्कूल में।
बात कुछ पुरानी सी है!
करीब-करीब 10 साल पुरानी।
अभिषेक को बहुत दिलचस्पी थी,अरबाज के रीति-रिवाजों को जानने की।उसके धर्म को समझने की।
वह अक्सर अरबाज से उसके धर्म के बारे में सवाल पूछा करता था।उसने कहीं सुना था कि,अरबाज के धर्म वाले एक गंदे से जानवर का नाम नहीं लेते हैं।
वह जानवर जो गुप्त काल के सर्वश्रेष्ठ देवता का प्रतीक था,इतिहासकार जिसे अनार्यों की मान्यता का एक आदिम देवता बतलाते हैं।जिसकी मान्यता उत्तर वैदिक कालीन आर्यों के सर्वोच्च देवता के एक अवतार के प्रतीक रूप में थी।
तो जैसा हर कहानी में होता है,वैसै ही एक दिन दोनों कहीं जा रहे थे।रास्ते में उसने अरबाज से पूछ लिया,कि"यह वही जानवर है ना।जिसका तुम लोग नाम नहीं लेते हो"।
इतना सुनते ही अरबाज भड़क उठा।फिर वाद विवाद संवाद में प्रारंभिक पंक्तियां निकल कर सामने आई।
"आइंदा तुम मुझसे कभी बात मत करना"।
अरबाज का गुस्सा सातवें आसमान पर था।
अभिषेक आगे सोच रहा था,कि कोई जानवर जलील या जहीन कैसे हो सकता है।
आखिर क्यों एक जानवर के नाम लेने भर से उसका दोस्त उस पर भड़क उठा।
उसने तो केवल इतना कहा था कि"अरबाज वह देखो।"
सूअर..
उस जलील जानवर का नाम मेरे सामने लेने की।"
संवाद----"जलील जानवर!क्या बकवास है?"
वाद----"हाँ हाँ जलील जानवर"
कहानी है अरबाज और अभिषेक की।
दो दोस्त,
सच्चे वाले दोस्त।
जहाँ अभिषेक एक रूढ़िवादी पंडित का लड़का था।
वहीं अरबाज एक लिबरल मुस्लिम का।
पर दोनों की सोच अपने पिता से बहुत अलग थी।
अरबाज जहां अपने बाप की विपरीत विचारधारा का था,वहिं अभिषेक को कट्टरता में बिल्कुल भी विश्वास नहीं था।
अभिषेक एक छोटे से स्कूल में पढ़ता था हिंदी मीडियम था शायद।
अरबाज एक बड़े से नामी कॉन्वेंट स्कूल में।
बात कुछ पुरानी सी है!
करीब-करीब 10 साल पुरानी।
अभिषेक को बहुत दिलचस्पी थी,अरबाज के रीति-रिवाजों को जानने की।उसके धर्म को समझने की।
वह अक्सर अरबाज से उसके धर्म के बारे में सवाल पूछा करता था।उसने कहीं सुना था कि,अरबाज के धर्म वाले एक गंदे से जानवर का नाम नहीं लेते हैं।
वह जानवर जो गुप्त काल के सर्वश्रेष्ठ देवता का प्रतीक था,इतिहासकार जिसे अनार्यों की मान्यता का एक आदिम देवता बतलाते हैं।जिसकी मान्यता उत्तर वैदिक कालीन आर्यों के सर्वोच्च देवता के एक अवतार के प्रतीक रूप में थी।
तो जैसा हर कहानी में होता है,वैसै ही एक दिन दोनों कहीं जा रहे थे।रास्ते में उसने अरबाज से पूछ लिया,कि"यह वही जानवर है ना।जिसका तुम लोग नाम नहीं लेते हो"।
इतना सुनते ही अरबाज भड़क उठा।फिर वाद विवाद संवाद में प्रारंभिक पंक्तियां निकल कर सामने आई।
"आइंदा तुम मुझसे कभी बात मत करना"।
अरबाज का गुस्सा सातवें आसमान पर था।
अभिषेक आगे सोच रहा था,कि कोई जानवर जलील या जहीन कैसे हो सकता है।
आखिर क्यों एक जानवर के नाम लेने भर से उसका दोस्त उस पर भड़क उठा।
उसने तो केवल इतना कहा था कि"अरबाज वह देखो।"
सूअर..
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