तुम क्या हो?...
एक अस्पष्ट शाब्दिक संयोजन....
जो खुदबखुद मेरी डायरी के पन्नों पर उतर रही हो।
तुम क्या हो?...
एक असफल परिवार नियोजन....
जो जनसंख्या विस्फोट को नकार रही हो।
तुम क्या हो?...
एक रद्दी किताब....
जो माँ सरस्वती के चित्र को मुंह चिढ़ा रही हो।
तुम क्या हो?...
एक फटा हिजाब....
जो नरम आरिज़ों को स्वतंत्र धूप महसूस करवा रही हो।
तुम क्या हो?...
एक ललित निबंध....
जो नीरस होकर भी पाठक के मन को भा रही हो।
हे वक़्त..
तुम क्या हो?...
मेरे श्मशान जाने के पहले के चरणों में से एक चरण....
जिसे मैं याद की संज्ञा देकर अपनी मूर्खता का परिचय देता हूँ।
हे होली..
तुम क्या हो?...
एक अवसर....
जब सब लोग विदित रूप से रंग बदलतें हैं।
हे "तुम"..
तुम क्या हो?...
हड्डी के ढांचे पर टँगा हुआ मांस का लोथड़ा....
जिसे सिर्फ मैं व्यर्थ ही खूबसूरत का विशेषण देता फिर रहा हूँ।
तुम क्या हो?...
मेरी धमनियों में प्रवाहित होने वाली विश्व.. कल्याणकारी रवानी को रोक देने वाला बाँध....
जिसे न जाने क्यों मैं लब से लगाना चाहता हूँ।
तुम क्या हो?...
एक सूनी सी राह....
जिस पर मैं चला जा रहा हूँ।
तुम क्या हो?...
एक सुन्दर सा स्वप्न....
जिसे मैं अनन्तकाल तक देखना चाहता हूँ।
तुम क्या हो?...
एक अतृप्त चाह....
जो सदियों से अपूर्ण बनी हुई है।
तुम क्या हो?...
मन की अगन....
जो अनंत काल से विचलित करने का प्रयास कर रही है।
तुम क्या हो?...
कार्बन की जननी....
जिसे मैं कोयला बनाऊँगा।
तुम क्या हो?...
वो सस्ती वाली चाय....
जिसे मैं मजबूरी में पीता हूँ।
तुम क्या हो?...
वो अल्हड़ बनारसीपन....
जिसे मैं जीता हूँ।
तुम क्या हो?...
एक मानसिक विकार....
जो प्रतिकार का प्रयास कर रही हो।
तुम क्या हो?...
एक संध्या...
जो न दिन की हुई....
न रात की।
तुम क्या हो?...
एक कुटिल नारी....
जो कमनीय नायिका बनने का प्रयास कर रही हो।
तुम क्या हो?...
मचलती हुई चांदनी....
जिसे आगत अमावस से कोई भय नही है।
तुम क्या हो?...
श्मशान की चिंगारी....
जो कई व्यक्तियों के ह्रदयों के घर्षण के फलस्वरूप उत्पन्न हुई हो।
तुम क्या हो?...
अव्यक्त,नि:शब्द,अनिर्वचनीय....
जो साहित्य का आकार ले रही हो।
तुम क्या हो?...
अतृप्त की अवधूत साधना....
जो वीभत्स है।
तुम क्या हो?...
अतृप्त कि वह तृप्ति....
जिसके लिए वह अघोर है।
एक अस्पष्ट शाब्दिक संयोजन....
जो खुदबखुद मेरी डायरी के पन्नों पर उतर रही हो।
तुम क्या हो?...
एक असफल परिवार नियोजन....
जो जनसंख्या विस्फोट को नकार रही हो।
तुम क्या हो?...
एक रद्दी किताब....
जो माँ सरस्वती के चित्र को मुंह चिढ़ा रही हो।
तुम क्या हो?...
एक फटा हिजाब....
जो नरम आरिज़ों को स्वतंत्र धूप महसूस करवा रही हो।
तुम क्या हो?...
एक ललित निबंध....
जो नीरस होकर भी पाठक के मन को भा रही हो।
हे वक़्त..
तुम क्या हो?...
मेरे श्मशान जाने के पहले के चरणों में से एक चरण....
जिसे मैं याद की संज्ञा देकर अपनी मूर्खता का परिचय देता हूँ।
हे होली..
तुम क्या हो?...
एक अवसर....
जब सब लोग विदित रूप से रंग बदलतें हैं।
हे "तुम"..
तुम क्या हो?...
हड्डी के ढांचे पर टँगा हुआ मांस का लोथड़ा....
जिसे सिर्फ मैं व्यर्थ ही खूबसूरत का विशेषण देता फिर रहा हूँ।
तुम क्या हो?...
मेरी धमनियों में प्रवाहित होने वाली विश्व.. कल्याणकारी रवानी को रोक देने वाला बाँध....
जिसे न जाने क्यों मैं लब से लगाना चाहता हूँ।
तुम क्या हो?...
एक सूनी सी राह....
जिस पर मैं चला जा रहा हूँ।
तुम क्या हो?...
एक सुन्दर सा स्वप्न....
जिसे मैं अनन्तकाल तक देखना चाहता हूँ।
तुम क्या हो?...
एक अतृप्त चाह....
जो सदियों से अपूर्ण बनी हुई है।
तुम क्या हो?...
मन की अगन....
जो अनंत काल से विचलित करने का प्रयास कर रही है।
तुम क्या हो?...
कार्बन की जननी....
जिसे मैं कोयला बनाऊँगा।
तुम क्या हो?...
वो सस्ती वाली चाय....
जिसे मैं मजबूरी में पीता हूँ।
तुम क्या हो?...
वो अल्हड़ बनारसीपन....
जिसे मैं जीता हूँ।
तुम क्या हो?...
एक मानसिक विकार....
जो प्रतिकार का प्रयास कर रही हो।
तुम क्या हो?...
एक संध्या...
जो न दिन की हुई....
न रात की।
तुम क्या हो?...
एक कुटिल नारी....
जो कमनीय नायिका बनने का प्रयास कर रही हो।
तुम क्या हो?...
मचलती हुई चांदनी....
जिसे आगत अमावस से कोई भय नही है।
तुम क्या हो?...
श्मशान की चिंगारी....
जो कई व्यक्तियों के ह्रदयों के घर्षण के फलस्वरूप उत्पन्न हुई हो।
तुम क्या हो?...
अव्यक्त,नि:शब्द,अनिर्वचनीय....
जो साहित्य का आकार ले रही हो।
तुम क्या हो?...
अतृप्त की अवधूत साधना....
जो वीभत्स है।
तुम क्या हो?...
अतृप्त कि वह तृप्ति....
जिसके लिए वह अघोर है।
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