Friday, 10 May 2019

लौहपथगामिनी

और धीरे से चल पड़ी,
विशाल सर्पाकार लौहपथगामिनी।
लगा कि नवजीवन का प्रारंभ हुआ।
पर ना तो यह पहला सफर है,
ना ही कुछ अगणित संख्याओं वाला।
फिर भी अक्सर अकेले सफर करना,
एक नया सा अहसास कराता है।
कुछ नये अहसासों का सृजन कराता है।
लंबे अरसे बाद अकेले लंबी यात्रा का मौका,
ये नहरें,ये बागीचों की वीरानगी।
ये पूर्णतया पक चुके गेहूँ के खेत,
ये कहीं थोड़ी उंचाई पर बसे अल्पविकसित गांव।
खेतों के बीच बड़ा सा गड्ढा,
और दूर काला स्याह धुआं उगलती,
ईंट भट्ठों की चिमनियां।
बड़ी आलीशान कोठियों की नगण्यता,
स्वच्छ भारत के प्रतीक इज्ज़त घर नाम्ना शौचालय,
और उनकी उपस्थिति पर प्रश्न चिन्ह लगातें, खेत की ओर अग्रसर मनुष्य।
सारे दृश्य केदारनाथ अग्रवाल की याद दिलाते हैं।
लगता है आज सब आत्मसात कर लेंगे।
बगल में अज्ञेय समान दाढ़ी वाले चच्चा,
और उनकी ध्यानस्थ बिटिया।
शायद किसी आंग्ल भाषा के उपन्यास में मग्न,
सामने बैठे असीम बातों से भरा छोटा सा परिवार,
पूरा माहौल कविता लायक है।
छोटे स्टेशनों को नकारती ये ट्रेन,
कभी धीरे धीरे,कभी जोर से नाग सदृश फुफकारती ये ट्रेन।
सीवान में बनी आलीशान कोठी,
"भविष्य में हम भी ऐसी बनवायेंगे" का दृढ़ निश्चय कर चुका मन।
बगल के बर्थ पर हो रहीं क्रिकेट की बातें,
और रेलवें के परित्यक्त भवन
मानों जीवन की निस्सारता को बतला रहे हों।
सारे दृश्यों व उनमें छिपे भावों को मिलाकर तैयार किया गया,
एक भ्रामक शाब्दिक यथार्थ।
जो भ्रम होते हुए भी,
यथार्थता से परिपूर्ण है।
एक लंबी शाब्दिक ऊहापोह,
और अंततः,
मुक्तिबोध की गहन वैचारिक कल्पनाशीलता,
नागार्जुन के व्यंग्यात्मकता,
केदारनाथ की प्रकृति,
निराला के समान निराली वर्णनात्मकता।
मैने भरसक किया यथासंभव प्रयत्न,
गहराई में डूब कर निकाले काव्यत्व के रत्न।
हुआ इन सब का सम्मिश्रण,
सामने आया अजीबोगरीब काव्यात्मक चित्रण।
एक अधपकी कविता।
कोई रहस्य नहीं,
और ना ही कोई गूढ़ गुम्फित शब्दावली।
फिर भी शायद नयी सी है।
कविता में अबाध कल्पना की कोंपल,
हांथों में पानी की बोतल।
दरवाजे पर खड़ा मैं,
बाहर शून्य में गड़ा मैं।
उस शून्य में क्या क्या था?
ब्रह्मराक्षसों की चीख,
प्रेतों द्वारा मुक्ति का प्रयास,
पिशाचों की पैशाचिकता,
डायनों का जादू,
चुड़ैलों की कहानियां,
बेताल के किस्से,
भूतों एवं अतृप्त आत्माओं से बचने के उपाय,
असुरों,दानवों,दैत्यों,राक्षसों,सुपर्णों,नागों की नकारात्मक संस्कृति,
अर्द्ध देवत्व प्राप्त जातियों(यक्ष,गंधर्व,किन्नर,अप्सराएं,देवदूत,विद्याधर,किंपुरुष,ऋक्ष,नायिकाएं,वानर,यमदूत,चारण,देव,गरूड़) का रहस्यमयी इतिहास
आधुनिक तपस्वियों(साधु,योगी,तांत्रिक,सिद्ध,नाथ,अघोरी,अवधूत,अभिशप्त,नागा) की तपस्या,
और हमारा एकाकीपन।
बस अब और नहीं.....



~दिव्य प्रकाश सिंह 'अवधुत'
 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस

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