Friday, 10 May 2019

मुस्कान

आज फिर एक भूल हुई,
कुछ पुरानी स्मृतियां,
मन में घुल गईं।
तो बात कुछ ऐसी थी,
परिकथाओं सरीखी जैसी थी।
शीत का प्रभाव चरम पर था,
सूर्य अपनी तीक्ष्णता,
त्याग कर नरम पर था।
कला संकाय के प्रांगण में,
हो रही थी राजनीतिक बहस,
कुछ डूबे थें उसमें,
कुछ कह रहे थे,
अब बस-बस-बस।
इन सब के बीच मैं भी था मग्न,
सामाजिक संकाय की कन्याओं के,
स्वप्नों में विचार मग्न।
अंतः स्थल में लगी थी अगन,
एक विशिष्ट सुंदरी को,
वश में करने की थी लगन।
साथ में कुछ खास मित्र थें,
हाथ में दूरभाष यंत्र था,
और उसमें कुछ छायाचित्र थें।
सहसा वह विशिष्ट कन्या,
दिखी अकस्मात,
सभी फिजूल की बातें,
बंद हो गई तत्पश्चात।
वर्ण था उसका शुद्ध धवल,
जैसे किसी,
आकाशगंगा का जल।
संकुचित था उसका बर्हिमन,
उत्थान पर था,
उसका निर्मम यौवन।
अधरों पे थी मुस्कान,
संयोगवश,
नाम भी था मुस्कान।
देख उसे मिट जाती थकान,
कल्पनाशील मन,
भरने लगता उड़ान।
वस्त्र उसके अत्याधुनिक,
मानों शास्त्रों की नायिका,
काल्पनिक।
वस्त्र उसके झिल-मिल,
हंसती थी खिल-खिल।
वस्त्र उसके श्वेत-श्याम,
लग रही थी निष्काम।
कैसे बताऊं?
उसकी अनोखी भाव-भंगिमा।
अव्याख्यायित है,
उसके अधरो की लालिमा।
वैसे तो अव्यवसायिक हैं,
उसकी कज्जल अलकें।
पर न जाने कितने लोगों को,
भरमाती होंगी धीरे से खुल कें।
पूरे दृश्य में वह खिल रही थी।
और तो और,
वह अपने सहपाठियों से,
बड़े ही प्यार से मिल रही थी।
होने ही वाला था संध्या काल,
उसकी स्मृतियाँ,
मन में रहेंगी चिरकाल।
पर बेकार है,
इन श्रृगांरिक वर्णनों की,
बारंबारता।
हमारे इस भ्रांत-क्लांत ह्रदय में,
तो छिपी है मुक्तिबोध,
सदृश गहन निस्सारता।
इन सारे दृश्यों में मैं,
किसी तटस्थ पर्यवेक्षक-सा।
जैसे किसी प्राचीन कृति में,
किसी नवीन क्षेपक-सा।
ये शरीर उसका,
प्रेमी रहेगा निर्निमेष।
जैसे अश्वत्थामा छानता फिरता है,
किन्ही प्राचीन शिवालयों के अवशेष।

~दिव्य प्रकाश सिंह 'अवधुत'
 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस

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