Friday, 10 May 2019

अश्लीलानंद बाबा

"ए मरदे का होई।"
"काहे कुच्छो बतईले ना का।"
प्रश्न का उत्तर ना देते हुए एक हृदयविदारक प्रश्न हमारे प्रगाढ़ मित्र गौरव ने हमीं से पूछ लिया।
हम क्या जवाब देते कि,अंदर कितनी बेइज्जती हुई।वैसे एक बात बताएं गौरव हमारे अंतर्मन की बात जान लेता है।उ हमारा खास मित्र है ई बात केवल हम नहीं कहते हैं।ई बात सारी फैकल्टी जानती है।
बात प्रथम वर्ष प्रथम सत्रांश के अंतिम दिनों की है।संकाय द्वारा राजभाषा,देवभाषा,प्राचीन भारतीय इतिहास तथा संस्कृति एवं पुरातत्व व आंग्ल भाषा जबरदस्ती की भाषा के रूप में  प्रदत्त थे।
राजभाषा के तो क्या कहनें!राजभाषा मतलब समझ रहे हैं न,मतलब कि हिंदी।कक्षाएं सुचारू रूप से तो नहीं पर चल रही थी,हम परंपरा के बारे में जान रहे थे,हम अपनी  हिंदी के बारे में जान रहे थे,इतिहास पढ़ने में तो आनंद के साथ साथ आनंद का बाप भी आ रहा था।आंग्ल भाषा मतलब  एबीसीडी नहीं बल्कि कुछ कविताएं और कहानियां अंग्रेजी में थी।
बची थी देवभाषा।
देवभाषा(संस्कृत) कक्षा 10 तक पढ़ी थी।11 और 12 में अनिवार्य संस्कृत हिंदी के साथ थी। पर अब तो शुरुआत से स्टार्ट करना था।कि कब संस्कृत की शुरुआत हुई?
कैसे माहेश्वर सूत्र आएं?
कैसे लौकिक संस्कृत का व्याकरण बना?
कैसे पाणिनी मुनि ने उन्हें बनाया?
मजा तो आ रहा था।तो श्रीगणेश भगवान शिव द्वारा पाणिनी मुनि को प्रदत्त सूत्रों से हुआ।सूत्रों को पढ़ के  हम खुद को संस्कृत का विद्वान समझने लगे थे।धीरे धीरे लघु सिद्धांत कौमुदी के माध्यम से वर्णों को जाना,फिर कालिदास के ग्रंथ कुमारसंभवम् मे हिमालय का वर्णन पढ़ा।
हमारे हिसाब से तो अध्ययन जोरों पर था।पर औरो को लग रहा था अध्ययन छोड़ के बाकी सब जोरों पर है।
तो सेमेस्टर के आखिर में परीक्षा से पहले संस्कृत का वाइवा था।बाहर सबको ज्ञान देने वाले अंदर अज्ञानी बनकर डांट खा रहे थे।हां मैं भी डांट खा रहा था।बाहर आया चेहरे पर कक्षा के उत्कृष्टतम बच्चे से भी ज्यादा खुशी थी।पर मित्रवा नें सब कुछ जान लिया।फिर वही दो पंक्तियां जो प्रारंभ में लिखी है,वही बात हुई।
मेरा तो वाइवा खराब चला गया था।गौरव का बचा था।हमारी पेशानियों पर बल पड़ रहे थे,मन में प्रण था कि अगले सत्र से मुसलसल काविश की जाएगी।

अचानक कथा का शीर्षक सामने से गुजरा।हाँ कथा का शीर्षक!

मन में आया,कि बिहारी की तरह काव्य रचना करने लगे या घनानंद की तरफ प्रेम के गीत गाने लगे या मलिक मोहम्मद जायसी की तरह उनके रूप का वर्णन किया जाए।
हम उलझन में थे।
वेशभूषा तो उनकी बहुत ही अलग थी।बिल्कुल विलायती वेशभूषा थी मोहतरमा की।
मानों अबहिएं लंदन से आयें हो।
हाफ पैंट(हॉफ की भी हॉफ),बॉयज कट बाल,मुफ्ती की टीशर्ट,पीठासीन छोटा वाला बैग,कान में सोनी का हेडफोन,हाथों में एप्पल का महंगा मोबाइल।
हम तो थे आदत से लाचार।मुँह बा के खालि देखते रह गयें।
तभी एक मित्र ने बताया कि दिल्ली की है।उसी वक्त इस कहानी के शीर्षक तथा कथानक ने जन्म ले लिया।
वाइवा की थकान,नंबर नहीं पाने का भय,बाद में पढ़ने का जोश,फेल होने का खतरा सब काफूर हो गए।मैं क्या सारे किशोरवय छात्र छात्राएं उसे ही देख रहे थे।आसपास के मित्र शोर मचा रहे थे कि बबवा त अश्लीलानंद बाबा निकला।


इतिश्री।
शायद........

एक छोटी सी बात

विवाद----"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?
उस जलील जानवर का नाम मेरे सामने लेने की।"
संवाद----"जलील जानवर!क्या बकवास है?"
वाद----"हाँ हाँ जलील जानवर"

कहानी है अरबाज और अभिषेक की।
दो दोस्त,
सच्चे वाले दोस्त।

जहाँ अभिषेक एक रूढ़िवादी पंडित का लड़का था।
वहीं अरबाज एक लिबरल मुस्लिम का।
पर दोनों की सोच अपने पिता से बहुत अलग थी।
अरबाज जहां अपने बाप की विपरीत विचारधारा का था,वहिं अभिषेक को कट्टरता में बिल्कुल भी विश्वास नहीं था।

अभिषेक एक छोटे से स्कूल में पढ़ता था हिंदी मीडियम था शायद।
अरबाज एक बड़े से नामी कॉन्वेंट स्कूल में।
बात कुछ पुरानी सी है!
करीब-करीब 10 साल पुरानी।

अभिषेक को बहुत दिलचस्पी थी,अरबाज के रीति-रिवाजों को जानने की।उसके धर्म को समझने की।
वह अक्सर अरबाज से उसके धर्म के बारे में सवाल पूछा करता था।उसने कहीं सुना था कि,अरबाज के धर्म वाले एक गंदे से जानवर का नाम नहीं लेते हैं।
वह जानवर जो गुप्त काल के सर्वश्रेष्ठ देवता का प्रतीक था,इतिहासकार जिसे अनार्यों की मान्यता का एक आदिम देवता बतलाते हैं।जिसकी मान्यता उत्तर वैदिक कालीन आर्यों के सर्वोच्च देवता के एक अवतार के प्रतीक रूप में थी।
तो जैसा हर कहानी में होता है,वैसै ही एक दिन दोनों कहीं जा रहे थे।रास्ते में उसने अरबाज से पूछ लिया,कि"यह वही जानवर है ना।जिसका तुम लोग नाम नहीं लेते हो"।
इतना सुनते ही अरबाज भड़क उठा।फिर वाद विवाद संवाद में प्रारंभिक पंक्तियां निकल कर सामने आई।
"आइंदा तुम मुझसे कभी बात मत करना"।
अरबाज का गुस्सा सातवें आसमान पर था।
अभिषेक आगे सोच रहा था,कि कोई जानवर जलील या जहीन कैसे हो सकता है।
आखिर क्यों एक जानवर के नाम लेने भर से उसका दोस्त उस पर भड़क उठा।
उसने तो केवल इतना कहा था कि"अरबाज वह देखो।"
                                                                        सूअर..

तुम कौन हो !

तुम क्या हो?...
एक अस्पष्ट शाब्दिक संयोजन....
जो खुदबखुद मेरी डायरी के पन्नों पर उतर रही हो।

तुम क्या हो?...
एक असफल परिवार नियोजन....
जो जनसंख्या विस्फोट को नकार रही हो।

तुम क्या हो?...
एक रद्दी किताब....
जो माँ सरस्वती के चित्र को मुंह चिढ़ा रही हो।

तुम क्या हो?...
एक फटा हिजाब....
जो नरम आरिज़ों को स्वतंत्र धूप महसूस करवा रही हो।

तुम क्या हो?...
एक ललित निबंध....
जो नीरस होकर भी पाठक के मन को भा रही हो।

हे वक़्त..
तुम क्या हो?...
मेरे श्मशान जाने के पहले के चरणों में से एक चरण....
जिसे मैं याद की संज्ञा देकर अपनी मूर्खता का परिचय देता हूँ।

हे होली..
तुम क्या हो?...
एक अवसर....
जब सब लोग विदित रूप से रंग बदलतें हैं।

हे "तुम"..
तुम क्या हो?...
हड्डी के ढांचे पर टँगा हुआ मांस का लोथड़ा....
जिसे सिर्फ मैं व्यर्थ ही खूबसूरत का विशेषण देता फिर रहा हूँ।

तुम क्या हो?...
मेरी धमनियों में प्रवाहित होने वाली विश्व.. कल्याणकारी रवानी को रोक देने वाला बाँध....
जिसे न जाने क्यों मैं लब से लगाना चाहता हूँ।

तुम क्या हो?...
एक सूनी सी राह....
जिस पर मैं चला जा रहा हूँ।

तुम क्या हो?...
एक सुन्दर सा स्वप्न....
जिसे मैं अनन्तकाल तक देखना चाहता हूँ।

तुम क्या हो?...
एक अतृप्त चाह....
जो सदियों से अपूर्ण बनी हुई है।

तुम क्या हो?...
मन की अगन....
जो अनंत काल से विचलित करने का प्रयास कर रही है।

तुम क्या हो?...
कार्बन की जननी....
जिसे मैं कोयला बनाऊँगा।

तुम क्या हो?...
वो सस्ती वाली चाय....
जिसे मैं मजबूरी में पीता हूँ।

तुम क्या हो?...
वो अल्हड़ बनारसीपन....
जिसे मैं जीता हूँ।

तुम क्या हो?...
एक मानसिक विकार....
जो प्रतिकार का प्रयास कर रही हो।

तुम क्या हो?...
एक संध्या...
जो न दिन की हुई....
न रात की।

तुम क्या हो?...
एक कुटिल नारी....
जो कमनीय नायिका बनने का प्रयास कर रही हो।

तुम क्या हो?...
मचलती हुई चांदनी....
जिसे आगत अमावस से कोई भय नही है।

तुम क्या हो?...
श्मशान की चिंगारी....
जो कई व्यक्तियों के ह्रदयों के घर्षण के फलस्वरूप उत्पन्न हुई हो।

तुम क्या हो?...
अव्यक्त,नि:शब्द,अनिर्वचनीय....
जो साहित्य का आकार ले रही हो।

तुम क्या हो?...
अतृप्त की अवधूत साधना....
जो वीभत्स है।

तुम क्या हो?...
अतृप्त कि वह तृप्ति....
जिसके लिए वह अघोर है।

कविता लिखने की कोशिश

आज फिर,
कविता लिखने की कोशिश हुई।
बल्कि यूं कहें कि,
दिमाग की अच्छी-खासी वर्जिश हुई।
तो हमारे कर्तव्यकर्म के सहायक कौन-कौन थे?
और हमारे इस कल्पित संसार के नायक कौन-कौन थे?
तो सहायक थी,
मेरी डायरी,
महंगी वाली कलम,
हमारी झुंझलाहट और विकराल गर्मी।
परिदृश्य कपोल कल्पित,
नायक अलौकिक और सात्विक,
प्रतिनायक था कुकर्मी व तामसिक,
तो परंपरा अनुसार,
नायक को उत्तम से भी उपर उत्तमोत्तम बताया गया।
नायिका को मुग्धा,
और प्रतिनायक को अधम बताया गया।
नायक व प्रति नायक उन्नीस-बीस ही थे,
किसी को अधिक तो,
किसी को थोड़ा कम बताया गया।
चूंकि उस संसार का स्रष्टा मैं ही था,
और तो और,
विनाशक,रक्षक और युगदृष्टा भी मैं ही था।
वहां पर पसरी दिगंत तक मादकता थी।
लेकिन,
उस रोमानी कल्पना के पीछे छिपी,
गंभीर भयावहता थी।
पर क्या इतने से परिचय को,
इतिहास कहा जा सकता है?
क्या इन्हीं अचेतन मस्तिष्क की कल्पनाओं मे,
ही आजीवन रहा जा सकता है?
मस्तिष्क की गहरी और चौड़ी स्वप्निल सुरंग,
उस में घूमते घोड़े के पर्यायवाची,
यथा-बाजी,हय व तुरंग।
उपरोक्त,
पंक्तियों को पढ़कर,
आप कह सकते हैं कि,
मैं मिथकीय हूं!
होना भी जरूरी है।
मिथक का अर्थ है-अर्द्धसत्य या कल्पना।
और कवि का काव्यत्व ही कल्पना है।
वह मिथकीयता ही है,
जो मुझसे अद्भुत और मायावी संसार गढ़वाती है।
और मैं आजीवन मिथकीय ही रहूंगा।
क्योंकि मिथकीयता ही है,
जो मुझे भावुक होने से बचाती है।
नहीं लिखा जाता मुझसे यथार्थ!
कैसे लिख पाऊंगा?
अब तो साहित्य की दया से,
यथार्थ के भी भेदोपभेद हो गए हैं।
जैसे--
         पत्रकारों व नेताओं का शाब्दिक यथार्थ।
         पुराने लोगों का पुराना यथार्थ।
         भारत भूषण अग्रवाल का स्वप्नहीन
         यथार्थ।
         और उदय प्रकाश का नया-नवेला
         जादुई यथार्थ।
         बचता है भविष्य का असंभावित
         यथार्थ।
दिनकर कहते हैं कि,
"अनगिनत है आपदाएँ"।
मैं कहता हूं कि,
यथार्थ भी अनगिनत है।
बकौल अशोक वाजपेयी-"भावुकता कवि को जटिलताओं को व्यक्त करने से रोकती है"।
किसी ने सच ही कहा है कि,
एक भावुक व्यक्ति हमेशा ऊहापोह में ही ग्रस्त रहता है।
उसकी अंतरात्मा अनिश्चय और निश्चय के बीच झूलती रहती है।
अरे हम कहां से चलें,
और कहां को भटक गए।
जैसे आसमान से गिरें,
और खजूर में अटक गयें।
तो,
इस कविता का मतलब,
नहीं है कुछ खास।
होने लगा है,
तुकों की कमी का आभास।
वहीं भग्न और अधूरे कल्पना-मिश्रित यथार्थ का कचरा,
है हमारे पास।
और रघुवीर सहाय के अनुसार तो-"पतझड़ के बिखरें पत्तों पर ही चढ़कर आता है मधुमास"।

~दिव्य प्रकाश सिंह 'अवधुत'
 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस

लौहपथगामिनी

और धीरे से चल पड़ी,
विशाल सर्पाकार लौहपथगामिनी।
लगा कि नवजीवन का प्रारंभ हुआ।
पर ना तो यह पहला सफर है,
ना ही कुछ अगणित संख्याओं वाला।
फिर भी अक्सर अकेले सफर करना,
एक नया सा अहसास कराता है।
कुछ नये अहसासों का सृजन कराता है।
लंबे अरसे बाद अकेले लंबी यात्रा का मौका,
ये नहरें,ये बागीचों की वीरानगी।
ये पूर्णतया पक चुके गेहूँ के खेत,
ये कहीं थोड़ी उंचाई पर बसे अल्पविकसित गांव।
खेतों के बीच बड़ा सा गड्ढा,
और दूर काला स्याह धुआं उगलती,
ईंट भट्ठों की चिमनियां।
बड़ी आलीशान कोठियों की नगण्यता,
स्वच्छ भारत के प्रतीक इज्ज़त घर नाम्ना शौचालय,
और उनकी उपस्थिति पर प्रश्न चिन्ह लगातें, खेत की ओर अग्रसर मनुष्य।
सारे दृश्य केदारनाथ अग्रवाल की याद दिलाते हैं।
लगता है आज सब आत्मसात कर लेंगे।
बगल में अज्ञेय समान दाढ़ी वाले चच्चा,
और उनकी ध्यानस्थ बिटिया।
शायद किसी आंग्ल भाषा के उपन्यास में मग्न,
सामने बैठे असीम बातों से भरा छोटा सा परिवार,
पूरा माहौल कविता लायक है।
छोटे स्टेशनों को नकारती ये ट्रेन,
कभी धीरे धीरे,कभी जोर से नाग सदृश फुफकारती ये ट्रेन।
सीवान में बनी आलीशान कोठी,
"भविष्य में हम भी ऐसी बनवायेंगे" का दृढ़ निश्चय कर चुका मन।
बगल के बर्थ पर हो रहीं क्रिकेट की बातें,
और रेलवें के परित्यक्त भवन
मानों जीवन की निस्सारता को बतला रहे हों।
सारे दृश्यों व उनमें छिपे भावों को मिलाकर तैयार किया गया,
एक भ्रामक शाब्दिक यथार्थ।
जो भ्रम होते हुए भी,
यथार्थता से परिपूर्ण है।
एक लंबी शाब्दिक ऊहापोह,
और अंततः,
मुक्तिबोध की गहन वैचारिक कल्पनाशीलता,
नागार्जुन के व्यंग्यात्मकता,
केदारनाथ की प्रकृति,
निराला के समान निराली वर्णनात्मकता।
मैने भरसक किया यथासंभव प्रयत्न,
गहराई में डूब कर निकाले काव्यत्व के रत्न।
हुआ इन सब का सम्मिश्रण,
सामने आया अजीबोगरीब काव्यात्मक चित्रण।
एक अधपकी कविता।
कोई रहस्य नहीं,
और ना ही कोई गूढ़ गुम्फित शब्दावली।
फिर भी शायद नयी सी है।
कविता में अबाध कल्पना की कोंपल,
हांथों में पानी की बोतल।
दरवाजे पर खड़ा मैं,
बाहर शून्य में गड़ा मैं।
उस शून्य में क्या क्या था?
ब्रह्मराक्षसों की चीख,
प्रेतों द्वारा मुक्ति का प्रयास,
पिशाचों की पैशाचिकता,
डायनों का जादू,
चुड़ैलों की कहानियां,
बेताल के किस्से,
भूतों एवं अतृप्त आत्माओं से बचने के उपाय,
असुरों,दानवों,दैत्यों,राक्षसों,सुपर्णों,नागों की नकारात्मक संस्कृति,
अर्द्ध देवत्व प्राप्त जातियों(यक्ष,गंधर्व,किन्नर,अप्सराएं,देवदूत,विद्याधर,किंपुरुष,ऋक्ष,नायिकाएं,वानर,यमदूत,चारण,देव,गरूड़) का रहस्यमयी इतिहास
आधुनिक तपस्वियों(साधु,योगी,तांत्रिक,सिद्ध,नाथ,अघोरी,अवधूत,अभिशप्त,नागा) की तपस्या,
और हमारा एकाकीपन।
बस अब और नहीं.....



~दिव्य प्रकाश सिंह 'अवधुत'
 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस

मुस्कान

आज फिर एक भूल हुई,
कुछ पुरानी स्मृतियां,
मन में घुल गईं।
तो बात कुछ ऐसी थी,
परिकथाओं सरीखी जैसी थी।
शीत का प्रभाव चरम पर था,
सूर्य अपनी तीक्ष्णता,
त्याग कर नरम पर था।
कला संकाय के प्रांगण में,
हो रही थी राजनीतिक बहस,
कुछ डूबे थें उसमें,
कुछ कह रहे थे,
अब बस-बस-बस।
इन सब के बीच मैं भी था मग्न,
सामाजिक संकाय की कन्याओं के,
स्वप्नों में विचार मग्न।
अंतः स्थल में लगी थी अगन,
एक विशिष्ट सुंदरी को,
वश में करने की थी लगन।
साथ में कुछ खास मित्र थें,
हाथ में दूरभाष यंत्र था,
और उसमें कुछ छायाचित्र थें।
सहसा वह विशिष्ट कन्या,
दिखी अकस्मात,
सभी फिजूल की बातें,
बंद हो गई तत्पश्चात।
वर्ण था उसका शुद्ध धवल,
जैसे किसी,
आकाशगंगा का जल।
संकुचित था उसका बर्हिमन,
उत्थान पर था,
उसका निर्मम यौवन।
अधरों पे थी मुस्कान,
संयोगवश,
नाम भी था मुस्कान।
देख उसे मिट जाती थकान,
कल्पनाशील मन,
भरने लगता उड़ान।
वस्त्र उसके अत्याधुनिक,
मानों शास्त्रों की नायिका,
काल्पनिक।
वस्त्र उसके झिल-मिल,
हंसती थी खिल-खिल।
वस्त्र उसके श्वेत-श्याम,
लग रही थी निष्काम।
कैसे बताऊं?
उसकी अनोखी भाव-भंगिमा।
अव्याख्यायित है,
उसके अधरो की लालिमा।
वैसे तो अव्यवसायिक हैं,
उसकी कज्जल अलकें।
पर न जाने कितने लोगों को,
भरमाती होंगी धीरे से खुल कें।
पूरे दृश्य में वह खिल रही थी।
और तो और,
वह अपने सहपाठियों से,
बड़े ही प्यार से मिल रही थी।
होने ही वाला था संध्या काल,
उसकी स्मृतियाँ,
मन में रहेंगी चिरकाल।
पर बेकार है,
इन श्रृगांरिक वर्णनों की,
बारंबारता।
हमारे इस भ्रांत-क्लांत ह्रदय में,
तो छिपी है मुक्तिबोध,
सदृश गहन निस्सारता।
इन सारे दृश्यों में मैं,
किसी तटस्थ पर्यवेक्षक-सा।
जैसे किसी प्राचीन कृति में,
किसी नवीन क्षेपक-सा।
ये शरीर उसका,
प्रेमी रहेगा निर्निमेष।
जैसे अश्वत्थामा छानता फिरता है,
किन्ही प्राचीन शिवालयों के अवशेष।

~दिव्य प्रकाश सिंह 'अवधुत'
 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस

मिलन

हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
श्मशान और संसार में,
कोई भेद न रहेगा।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
सभ्यताएं राख हो जायेंगी।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
अतृप्तों को तृप्ति मिल जायेगी।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
काल कराल भी पराजित हो जायेंगे।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
साधकों की साधनाएं देवत्व को भी ललकारेंगी।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
मृत्यु अपने स्वामी का भी वरण करेगी।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
महानायकों की अस्थियों को कुत्ते चबायेंगे।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
हमारा सूर्य स्याह कृष्ण-विवर में परिवर्तित हो जायेगा।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
संवाद के लिए भाषाओं की जरूरत न होगी।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
कल्पना और यथार्थ सम्मिश्रित हो जायेंगे।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
वर्तमान किंवदंतियों से भर जायेगा।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
भूत का अस्तित्व ही मिट जायेगा।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
यह असीम ब्रह्मांड घनीभूत हिरण्यगर्भ में तब्दील हो जायेगा।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
नश्वरों की समस्त इच्छायें फलीभूत हो जायेंगी।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
चिरपुरातन और चिरनवीन मे ऐक्य स्थापित हो जायेगा।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
अगणित और अनंत,नगण्य हो जायेंगे।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
इतिहास एक अधभूली-सी कहानी बन कर रह जायेगा।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
युगों और क्षणों के बीच का अंतराल समाप्त हो जायेगा।
हमारा मिलन होगा,
पर कब?
तब,
जब,
प्रेम भी नैराश्य को ग्रहण कर लेगा।
तब,
तब,
कहीं जा के,
हम मिलेंगे।
शायद!
क्या
सच में मिलेंगे?
~दिव्य प्रकाश सिंह 'अवधुत'
 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस